Nta Ugc Net Paper 1 Communication Notes: Communication Barriers

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संचार में आने वाली प्रमुख बाधाएँ (Communication Barriers)

हमने संचार प्रक्रिया के अंतर्गत शोर का वर्णन किया, वह एक प्रकार से संचार बाधा ही है। संचार प्रक्रिया में कई बाधाएँ आ जाती हैं, फलस्वरूप प्रेषित संदेश या तो गलत हो जाता है। या अपूर्ण रूप से ग्रहण किया जाता है। कभी-कभी सम्प्रेषण संबंध भी टूट जाता है। सम्प्रेषण में आने वाली बाधाओं को निम्नलिखित प्रकार से सारणीकृत किया गया है।

संगठनात्मक बाधाए (Organizational Barriers)

ये बाधाएँ संगठन के विकास के समय उत्पन्न होती हैं। इसके लिए निम्नलिखित को जिम्मेवार ठहराया जा सकता है:

  1. संगठन का आकार (size of organization)
  2. कर्मचारियों के बीच भौतिक दूरी (physical distance)
  1. कार्य विशेषज्ञता (job specialization)
  2. संगठन की संस्कृतिः यह स्वतंत्रता और विश्वास पर प्रभाव डालती है।
  3. संगठनात्मक नियम और अधिनियम (organizational rules and regulations)
  1. संगठन में सत्ता संरचना (power structure)
  2. संगठनात्मक ढांचे में जटिलता (complexity in organizational structure)
  1. अपर्याप्त सुविधाएँ और अवसर (inadequate facilities and opportunities)
  1. वरिष्ठ और अधीनस्थ कर्मचारियों के बीच सहयोगकी कमी (lack of coordination)

भौतिक एवं याँत्रिक बाधाएँ (Physical and Mechanical Barriers)

याँत्रिक बाधाओं को पारस्परिक और जनसंचार, दोनों में शामिल किया जा सकता है याँत्रिक बाधाओं के कुछ उदाहरण हैं-रेडियो प्रसारण में बाधा, टीवी स्क्रीन पर धुंधलापन, | टेलीफोन उपकरणों में अश्राव्यता, इत्यादि। भौतिक बाधाओं में शोर, अदृश्यता, वातावरण, भौतिक सुविधाएँ, खराब स्वास्थय, ध्यान केंद्रित न हो पाना, इत्यादि को शामिल किया जाता है।

  1. प्रतिस्पर्धा करते हुए उद्दीपन या संदीपन (Competing Stimuli): हमारा ध्यान बंटाने के लिए वातावरण में बहुत सारे उद्दीपन प्रतिस्पर्धा कर रहे होते हैं, जैसे कि छात्र कक्षा में पढ़ रहे हों तथा बाहर किसी छात्र संघ का चुनाव अभियान चल रहा हो, जिसमें कुछ ध्यान आकर्षित होना स्वाभाविक सी बात
  2. पर्यावरण से संबंधित तनाव (Environmental Stress): कक्षा में उच्च ताप, वायु-संचालन का उपयुक्त न होना, इत्यादि।
  3. व्यक्ति -निष्ठ तनाव (Subjective stress): अनिद्रा, खराब स्वास्थ्य, दवा का प्रभाव, आदि।
  4. प्राप्तकर्ता के माध्यम से अपरिचित होना (Receiver’s Unfamiliarity with Medium): यदि प्रेषक या प्राप्तकर्ता एक-दूसरे के माध्यम से अपरिचित हों, तो यह भी संचार बाधा का ही कार्य करता है, जैसे प्रेषक और प्राप्तकर्ता अगर स्काइप (Skype) के द्वारा वार्तालाप करना चाहें, तो दोनों को इसका उपयोग आना चाहिए।

मानसिक अवरोध या बाधाएँ (Psychological Barriers)

  1. व्यक्ति विशेष संदर्भ (Frame of Reference): यह हमारी संस्कृति (आदर्श, मूल्य, आस्था-विश्वास आदि का मिश्रण), बाल्यावस्था के अनुभव, आनुवंशिकता (heredity) पर निर्भर करता है। किन्ही भी दो व्यक्तियों का संदर्भ समान नहीं हो सकता तथा यह समय के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। यह एक आधारभूत परिमाण है कि हम संचार में जो अर्थ छिपा है, जो कि यह दर्शाता है कि उसको एक व्यक्ति कैसे ग्रहण करता है। । इसके अलावा किसी संचार संदेश का अर्थ स्थिति पर भी निर्भर करता है जिसको हम स्थितिजन्य या पारिस्थितिक संदर्भ (situational context) भी कह सकते हैं। जब शिक्षक कक्षा या अभिभावक घर में यह कहते हैं कि परिश्रम करो, तो परिश्रम करना विद्यार्थी जीवन के हर क्षेत्र पर लागू हो सकता है, लेकिन परीक्षा के दिनों में यह मुख्यतः अध्ययन पर बल देने के लिए होता है।
  1. आत्म छवि या स्वतः धारणा (Self-image or Self-Concept): यह भी उपरोक्त वर्णित संदर्भ से ही संबंधित है। हर व्यक्ति अपने बारे में कुछ छवि या धारणा बना कर रखता है और हमारी आत्म छवि अचेतन मन में शब्दों का अर्थ निकालने में एक भूमिका निभाती है। इसमें भी हमारे समाजिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक एवं स्वयं के अनुभव महत्त्वपूर्ण भूमिकाअदा करते हैं।
  1. अनुभवक्षेत्र (Field of Experience): विज्ञान के छात्र को शायद हिंदी साहित्य की बातें ज्यादा अच्छी तरह से समझ में न आएँ, जितना की एक मानविकी विद्यार्थी को आने की संभावना रहती है।
  1. संज्ञानात्मक मतभेद (Cognitive Differences): संज्ञानात्मक को हम ज्ञान-संबंधी भी कहते हैं और यदि हमारी सोच या ज्ञान में कोई मतभेद हो, तो उनको संज्ञानात्मक मतभेद कहा जाता है। एक शरारती छात्र रैगिंग के विरुद्ध पोस्टर के अर्थ एवं उद्देश्य को अच्छी तरह से समझता है, चाहे उसकी प्रतिक्रिया उतनी अनुकूल न हो।
  1. मानसिक डर या बचाव की मुद्रा (Mental Fear or Defensive Posturing): जो व्यक्ति डरा सहमा रहता हो वह किसी भी संचार-संदेश की प्रतिक्रिया में शीघ्र ही बचाव की मुद्रा (defensive) में आ जाएगा और संदेश का सही अर्थ नहीं ले पाएगा। यदि एक शिक्षक कक्षा में यह पूछ ले कि (कोई) शरारत किसने की है, तो एक निर्दोष छात्र यह कह बैठे कि यह शरारत उसने नहीं की और शक के घेरे में आ जाए, इस प्रकार के मानसिक डर या बचाव की मुद्रा को दर्शाता है।
  1. चयनात्मक धारणा (Selective Perception): यह एक तरह का पूर्वाग्रह ही है, हम ऐसे उद्दीपनों (stimuli) को नजरअंदाज कर देते हैं, जो कि हमारी | पूर्व मान्यताओं के विरुद्ध हों और भावनात्मक या मानसिक परेशानी का कारण बन सकते हैं। मान लीजिए कि एक शिक्षक किसी छात्र के बारे में अनुकूल राय रखता है और वह छात्र खराब प्रदर्शन करे, तो वह शिक्षक उसके बारे में फिर भी अच्छा ही कहता है, उसकी गलतियों को नजरअंदाज कर दें, तो हम यह कहेंगे कि वह शिक्षक चयनात्मक धारणा से ग्रसित है।
  1. निस्पंदन (Filtering): इसका अर्थ होता है कि सूचना में जोड़-तोड़ करके उसको प्राप्तकर्ता के अनुकूल बनाना, लेकिन इस प्रक्रिया में मूल-संदेश में छिपा अर्थ बदल जाता है। इसको ‘ग्रेपवाइन’ भी कहा | जाता है।

भाषाई एवं सांस्कृतिक बाधाएँ (Linguistic and Cultural Barriers)

इसका तात्पर्य उन अवरोधों से है, जिनका संबंध भाषा से होता है। इसमें अस्पष्ट शब्द, अनावश्यक शब्द, गलत उच्चारण, अस्पष्ट ग्राफ़िक्स तथा संकेत को शामिल किया जाता है।

  1. अर्थसंबंधी अवरोध (Semantic Barriers): वर्तमान समय में अत्याधुनिक संचार माध्यम (ई-मेल, ई-फैक्स, ई-प्रिंट, इत्यादि) पर विविध भाषा में सूचनाओं का प्रवाह हो रहा है, जिसे ग्रहण करने के लिए अल्प भाषी को अनुवाद करना पड़ता है। दोषपूर अनुवाद होने की स्थिति में सूचना का वास्तविक अर्थ परिवर्तित हो जाता है। अत: संदेश का दोषपूर्ण अनुवाद होने से संचार में भाषाई बाधा उत्पन्न होती है।
  2. उच्च प्रसंग या निम्न प्रसंग (High or Low Context): इनको क्रमश: उच्च संदर्भ या निम् संदर्भ भी कहा जा सकता है। यदि हम कोई बात कर के लिए लम्बी-चौड़ी भूमिका बांधे तो उसको = संदर्भ कहते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण भारत सऊदी अरबिया, जापान, आदि एशिया के देश हैं। यः हम सीधे मुद्दे पर बात करें तथा उसको एक अनुबंध (contract) का रूप दें, तो उसे निम्न संदर्भ संच कहते हैं। इसमें संदेश को न्यूनतम शब्दों का प्रयोग करके संप्रेषित करने की चेष्टा की जाती है। इस उदाहरण पश्चिमी सभ्यता के देश हैं।
  3. पारसांस्कृतिक संचार (Cross-cultural Communication): जब संचार में अलग-अलसांस्कृतिक पृष्ठभूमि से लोगों के संवाद में क्य विभिन्ताएँ और समानताएँ होती हैं, कैसे वह आपस – संवाद करते हैं और कैसे वह दूसरे संस्कृति के लोग से संवाद करते हैं, आदि का अध्ययन किया जाता है, तो उसको पार-सांस्कृतिक संचार कहा जाता है।
  4. भाषा का अल्प ज्ञान होना (Insufficient Knowledge of a Language): समाज में अनेक प्रकार की भाषाएँ प्रचलित हैं। यह जरूरी नहीं है कि एक व्यक्ति को सभी भाषाओं का ज्ञान हो, परन्तु भाषाओं का अल्प ज्ञान होने से भी संचार में बाधा उत्पन्न होती है। वैश्वीकरण के युग में अधिक भाषाओं का ज्ञान संचार में सहायक हो सकता है।
  5. सांस्कृतिक विभिन्नता (Cultural Differences): प्रभावी संचार के लिए आवश्यक है कि हम विभिन्न संस्कृतियों के मूल्यों, मान्यताओं, और आकांक्षाओं, आदि के रहस्यों को समझे। भारतीय संस्कृति में रूक जाने का संदेश देने के लिए लाल रंग का प्रयोग किया जाता है, लेकिन दक्षिण कोरिया में इस उद्देश्य के लिए सफ़ेद रंग का प्रयोग किया जाता है।
  6. तकनीकी भाषा का ज्ञान होना (Lack of Technical Knowledge): इस भाषा का प्रयोग अक्सर कार्य क्षेत्र में किया जाता है। कई बार लोग अपनी तकनीकी भाषा में संदेश सम्प्रेषित करते हैं, जो कि आम लोगों को समझ में नहीं आता है, जिससे संचार के दौरान बाधा उत्पन्न होती है।

All Communication Notes Credit Goes to : http://gyansagarntanet.com/

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