Nta Ugc Net Communication Study Material Pdf : Types of Communication

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संचार  के प्रकार (Types of Communication)

संबंधों के आधार पर संचार का वर्गीकरण

(Classification on the Basis of Relationship Element)

1. अवैयक्तिक संचार (ImpersonalCommuni cation):

अवैयक्तिक संचार को आत्म-चर्चा, आत्म-विचार या आत्म-मंथन के रूप में भी जाना जाता है। इसमें संदेश-प्रेषक एवं संदेश प्राप्तकर्ता एक ही व्यक्ति होता है। यह एक स्वचालित संचार प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से मनुष्य स्वयं का एवं दूसरों का मूल्याँकन करता है। इसमें ध्यान लगाना, चिंतन करना | (meditation), इष्ट देव से प्रार्थना करना, इत्यादि सम्मिलित हैं। हम प्रायः ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं-‘हे परमात्मा’ (Oh My God), ‘यह क्या हो गया’ (Oh का No) (जब किसी संकट की स्थिति में हो), (जब उत्तेजित हो), इत्यादि । ये सब भी अंत: वैयक्तिक संचार के उदाहरण हैं।

इस प्रकार के संचार का प्रयोग हम अपने जीवन की योजना तैयार करने के लिए, हम जीवन में जो करना चाहते हैं, उसका पूर्वाभ्यास करने के लिए करते है जिस प्रकार से हम स्वयं से संवाद स्थापित करते हैं, वह हमारे आत्मसम्मान को प्रभावित करता है। यदि कोई व्यक्ति परीक्षा में विफल हो जाए, स्वयं से कहे, ‘मैं कितना मूर्ख हैं, कुछ करने लायक नही हूँ। दूसरी ओर वह स्वयं से यह कहे, ‘मैं बेहतर कर सकता हूँ’.

अंतर्वैयक्तिक संचार (InterpersonalCommunication):

अंतर्वैयक्तिक संचार से तात्पर्य दो व्यक्तियों के बीच विचारों, भावनाओं और सूचनाओं के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आदान-प्रदान से है। इसके लिए दो व्यक्तियों के बीच सम्पर्क का होना जरूरी है। अत: अंतर्वैयक्तिक संचार दो-तरफा (two way) प्रक्रिया होती है। अंतर्वैयक्तिक संचार में प्रतिपुष्टि (feedback) का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसी के आधार पर संचार प्रक्रिया आगे बढ़ती है। टेलीफोन पर वार्तालॉप, ई-मेल या सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर चैटिंग अंतर्वैयक्तिक संचार के अंतर्गत आते हैं। संदेश भेजने के अनेक तरीके होते हैं, जैसे—भाषा, शब्द, चेहरे की प्रतिक्रिया, हाथ हिलाना, आगे-पीछे हटना, सिर हिलाना, इत्यादि।

समूह संचार (Group Communication):

यह अंतर्वैयक्तिक संचार का विस्तार है, जहाँ दो से अधिक व्यक्ति विचारों एवं कौशल का आदान-प्रदान करते हैं। समूह संचार की प्रक्रिया को समझने के लिए समूह के बारे में जानना आवश्यक है। समूह संचार कितना बेहतर होगा, प्रतिपुष्टि कितनी अधिक मिलेगी, यह समूह के प्रधान और उसके सदस्यों के परस्पर संबंधों पर निर्भर करता है। इसमें सामूहिक निर्णय लेने, आत्मअभिव्यक्ति (self-expression), व्यक्तिगत प्रभाव में वृद्धि, आदि को सम्मिलित किया जाता है।

जनसंचार (Mass Communication):

आधुनिक युग में जनसंचार काफी प्रचलित शब्द है। इसका निर्माण दो शब्दों जन + संचार के योग से हुआ है। जनसंचार का अर्थ विशाल जनसमूह के साथ संचार करने से है। इसे मध्यस्थता संचार’ भी कहा जाता है। यह याँत्रिक उपकरणों का उपयोग करता है, जिससे कई संदेशों को एक साथ बहुत लोगों तक पहुँचाया जा सकता है। इसमें सम्प्रेषण के लिए औपचारिक व व्यवस्थित संगठन होता है। समाचार पत्र, टेलीविजन, रेडियो, सिनेमा, इंटरनेट, इत्यादि अत्याधुनिक जनसंचार माध्यम हैं।

 

चैनल के आधार पर संचार का वर्गीकरण

(Communication Types on the Basis of Channels) चैनल के आधार पर संचार दो प्रकार के होते हैं:

  1. शाब्दिक संचार (Verbal Communication)

  2. मौखिक संचार (Oral Communication)

शाब्दिक संचार (Verbal Communication) शाब्दिक का अर्थ है—शब्दों का प्रयोग करना। शाब्दिक संचार में, संदेश शाब्दिक रूप में प्रसारित किया जाता है। इस सम्प्रेषण में सदैव भाषा का प्रयोग किया जाता है। यह मौखिक

और लिखित, दोनों तरह से हो सकता है। | इस प्रकार के संवाद में सबसे बड़ा जोखिम किसी शब्द को स्वेच्छित अर्थ देने का होता है, फिर शब्दों का अर्थ देश और काल के अनुसार परिवर्तित भी हो सकता है। समान्यता शब्द ऐसी कोई घटना नहीं होते जिनका हर बार रिकॉर्ड रखा जाए। शाब्दिक संचार को पुनः दो प्रकार के संचार में वर्गीकृत किया जा सकता है—मौखिक संचार एवं लिखित संचार।

      मौखिक संचार (Oral Communication) इसमें मौखिक रूप में वाणी द्वारा विचारों एवं सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जाता है। इस संचार में प्रेषक और प्राप्तकर्ता दोनों आमने-सामने रहते हैं। मौखिक संचार में प्रत्यक्ष वार्तालाप, टेलीफोन के माध्यम से वार्तालाप, भाषण, परिचर्चा, सामूहिक चर्चा, वीडियो, रेडियो, टीवी, आदि को सम्मिलित किया जाता है।

मौखिक संचार को प्रभावित करने वाले मुख्यता निम्नलिखित कारक होते हैं:

  1. ध्वनिपिच और ध्वनिमात्रा (Volume and

Pitch of Sound): यह शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण तत्व है। पिच मूलतः स्वर की उच्चता या निम्नता (highness or lowness) का स्तर है, यह ध्वनि तरंगों की आवृत्ति (frequency) पर निर्भर करता है। शिक्षक की आवाज और सही भाषा की जानकारी भाषण के मुख्य कारक होते हैं। ध्वनि-मात्रा (sound volume) लोगों की संख्या और सामीप्य पर निर्भर करता है और इसे डेसीबल (decibel) में मापा जाता है।

  1. गति (Rate): यह मूलतः शब्दों को वितरित (delivered) करने की गति है। जब संदेशवाहक बोल रहा हो, तो नियमितता बनाए रखनी चाहिए क्योंकि एक नियमित रूप से या लयबद्ध आवाज आपका आत्मविश्वास बढ़ाती है। अनियमित भाषण अनिश्चितता का संकेत हैं। यदि शिक्षक धीमी गति से बात करता है, तो छात्र हताश हो सकते हैं, क्योंकि उन्हें जानकारी पर्याप्त या वांछित ढंग से प्राप्त नहीं होती है।
  1. उच्चारण में स्पष्टता (Clarity in Pronunciation): उचित उच्चारण और शब्दों का वितरण संदेश को प्रभावशील बनाने में योगदान देते हैं। यह संदेशवाहक के विचारों की स्पष्टता पर भी निर्भर करता है। पिच, वॉल्यूम, गति और स्पष्टता को पैरालेंग्वेज (paralanguage) के घटक भी कहा जाता है।

मौखिक संचार के मुख्य लाभ (Advantages of Oral Communication)

  1. मौखिक संचार सहज और स्वाभाविक होता है।
  2. यह दूसरों को समझाने के लिए सरल होता है।
  3. इस संचार में आमतौर पर शब्दों का चयन श्रोताओं के अनुकूल होता है।
  4. आमने-सामने संवाद से कम त्रुटियाँ।
  5. तेज गति से संदेश का आदान-प्रदान होने से समय की बचत।
  1. मौखिक होने से कम खर्च।
  2. गोपनीयता बनी रहती है।
  3. शारीरिक हाव-भाव के साथ प्रभावपूर्ण संचार होता है।
  4. भौतिक संसाधनों की आवश्यकता नहीं जैसे कागज, कंप्यूटर, आदि।
  1. तीव्र होने से आपातकालीन परिस्थितियों में अत्यन्त उपयोगी।
  1. एक साथ कई लोगों के साथ संचार।
  2. तुरंत प्रतिपुष्टि।

मौखिक संचार की सीमाएँ (Limitations of Oral Communication)

  1. मौखिक संचार में शब्द लिखित संचार की तरह स्थायी नहीं होते है। ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि मौखिक संचार में बोले गए कई शब्द हवा में ही गायब हो जाते हैं।
  2. सुने हुए शब्दों को याद रख पाना कठिन कार्य है, इस बात की संभावना लम्बे संदेश में अधिक होती है।
  3. मौखिक संचार को अन्य संस्कृतियों के लोगों द्वारा नहीं समझा जा सकता है।
  4. लिखित संचार की तुलना में मौखिक संचार की विधिवत मान्यता कम होती है।
  5. मौखिक संचार का प्रयोग का क्षेत्र सीमित है।

 

लिखित संचार (Written Communication)

लिखित संचार में, लिखे हुए संकेत और प्रतीक, दोनों हस्तलिखित रूप में उपयोग किए जाते हैं। लिखित संचार से तात्पर्य ऐसी सूचनाओं से है, जो शब्दों में तो होती है। लेकिन उसका स्वरूप मौखिक न होकर लिखित होती है। संदेशवाहक के लेखन कौशल, शैली, और ज्ञान एवं व्याकरर संदेश की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। लिखित संचार में संदेश ई-मेल, पत्र , रिपोर्ट, ज्ञापन, आदि के माध्यम से  प्रेषित किया जा सकता है। लिखित संचार माध्यमों का उपयोग विभिन्न सरकारी, गैर-सरकारी संस्थाओं में सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए किया जाता है।

लिखित संचार के लाभ (Advantages of Written Communication)

  1. इस संचार में संदेश भेजने से पहले कई बार संपादित और संशोधित किया जा सकता है, जिससे संदेश में त्रुटि की संभावना कम से कम रहती है।
  2. लिखित संचार प्रत्येक भेजे गए संदेश का एक स्वचालित रिकॉर्ड प्रदान करता है, जिसका भविष्य में साक्ष्य और संदर्भ के रूप में प्रस्तुतिकरण संभव है।
  3. लिखित संचार में प्रेषक और प्राप्तकर्ता की एक साथ उपस्थिति अनिवार्य नहीं होती है।
  4. लिखित संचार में प्राप्तकर्ता संदेश को पूरी तरह से समझने और उचित प्रतिपुष्टि देने के लिए अधिक सक्षम होता है।
  5. कम लागत में स्पष्ट और विस्तृत जानकारी।

लिखित संचार की सीमाएँ (Limitations of Written Communication)

  1. इस संचार में सहज संचार की सम्भावना मौखिक संचार से कम होती है, यद्यपि आजकल चैटिंग, आदि का उपयोग काफी बढ़ गया है।
  2. यह अगर औपचारिक हो, तो इसमें काफी समय लग सकता है।
  3. मौखिक की तुलना में इसमें सहायक सामग्री की आवश्यकता जैसे कागज, मोबाइल, टाइपरायटर, कंप्यूटर, आदि।
  4. मौखिक संचार की तुलना में अधिक जटिल।
  5. अलग-अलग प्राप्तकर्ताओं द्वारा अलग-अलग व्याख्या संभव। व्यावहारिक रूप में संचार मौखिक संचार एवं लिखित संचार का मिश्रण होता है।

अशाब्दिक संचार (Non-verbal Commnication)

हम प्रायः यह कहते हैं कि ‘करनी कथनी से अधिक बलवती होती है’ (Actions speak louder than words)। अशाब्दिक संचार के अंतर्गत विचारों व भावनाओं को बिना शब्दों के अभिव्यक्त किया जा सकता है। जब विचारों व भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं होता है, तब अशाब्दिक संचार ही सबसे प्रभावी माध्यम होता है। आवाज

उतार-चढ़ाव, शारीरिक मुद्रा, मुख-मुद्राएँ, चक्षु-संपर्क, अर्श, वाणी संकेत, आदि अशाब्दिक संचार के अलग-अलग रूपांतर है। यह संचार शाब्दिक संचार का पूरक होता है, और  देश में छिपा अर्थ ज्यादा स्पष्ट हो सकता है।

  1. शारीरिक मुद्रा (Body Language): उदाहरण के लिए, हाथ हिलाना, हाथों से संकेत करना, मुंह हिलाना, इधर-उधर चलना।
  2. वेशभूषा (Appearance): वेशभूषा से सामने वाले की मन:स्थिति का पता चलता है। इसका संदेश–अर्थ संस्कृति, व्यक्ति के व्यवहार, विचार, पृष्ठभूमि पर निर्भर करता है।
  3. स्पर्श (Touch): स्नेहवश किसी के गाल को थपथपाना, दु:ख की घड़ी में किसी के सिर या कंधे पर हाथ रखना व बांह पकड़ना, दोस्तों से हाथ मिलाना, इत्यादि अमौखिक संचार है। भीड़ में आपने किसी को स्पर्श किया और व आपको आगे जाने के लिए जगह दे देता है।
  4. निकटता (Proximity): इससे सामने वाले व्यक्ति से हमारा संबंध प्रकट होता है।

उपरोक्त के अलावा सम्पर्क, व्यक्तित्व का प्रभाव, आदि भी अशाब्दिक संचार के अवयव है।

 

काइनेसिक्स, मेटासंचार एवं पैरालिंगुइस्टिक्स ( kinesis, Meta or PARA LINGUISTICS Communication )

ये तीनों शब्द गैर-मौखिक संचार के विभिन्न आयाम हैं।

काइनेसिक्स (Kinesics): यह गैर-मौखिक या गैरशाब्दिक संचार का एक ही रूप माना जाता है। इसको  संचार के संदर्भ में शारीरिक गतिविधियों के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया गया है। उदाहरणार्थ शारीरिक हाव 9419 (body language), Fiona aicit (sign language), सम भाषा (paralanguage), स्पर्श (touch), नेत्र संपर्क (eye contact)। सरल भाषा में यह शरीर की भाषा की। व्याख्या है।

मेहराबियाँ (Mehrabian) के अनुसार, ‘संचार में शब्दों का 70%, स्वर के लहजे का 38%, और हमारे शरीर की भाषा संचार के 55% योगदान रहता है। इस को हमने 7/38/55 नियम का नाम दे दिया है। इस प्रकार से ये 3 Vs बन जाते हैं-Verbal, Vocal and Visual। इस प्रकार, व्यावहारिक रूप में संचार मौखिक एवं गैर-मौखिक संचार का एक मिश्रण है।

मेटा संचार (Meta communication): प्रायः हम जो कहते हैं, और जो अर्थ गृहीता तक पहुँचता है, उनमें कुछ अंतर रहता ही है। सभी अशाब्दिक संकेत जैसे बात कहने का लहजा, चेहरे की अभिव्यक्ति, आदि अर्थ को वांछित स्तर से अच्छे ढंग से भी पहुंच सकते हैं और बुरे ढंग से भी। ऐसी स्थिति को समझने को मेटा संचार कहते हैं। यह संचार प्रक्रिया सतह के नीचे (beneath the surface) चल रही है। मेटा शब्द को हम सूचना प्रौद्योगिकी प्रयोगों में भी एक उपसर्ग की तरह प्रयोग करते हैं, जिसका अर्थ है ‘एक अंतर्निहित परिभाषा या विवरण।’

पैरालिंगुइस्टिक (Paralinguistics): यह संचार ‘स्वर’ (tone) का और ‘शब्द कैसे कहे गए हैं’ का अध्ययन है। जब आप अपना मुंह बात करने के लिए खोलते हैं, आप स्वयं के बारे में काफी कुछ कह जाते हैं, जिनका अक्सर आपके कहे शब्दों से कुछ लेना देना नहीं होता। पैरालिंगुइस्टिक संकेतों आपके कहे वचनों के हर तत्व और अर्थों के भेद को वर्णित करता है।

अशाब्दिक संचार से संबंधित कुछ और शब्द निम्न रूप से वर्णित हैं।

ओकुलिसिस (Oculesics): संचार में नेत्र/ पलकों का प्रयोग करना।

प्रोसेमिक्स (Proxemies): स्थल का उपयोग यदि कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री के निकट वाली कुर्सी पर बैठा हो, तो इसका क्या अभिप्राय है?

हप्टिक्स (Haptics): स्पर्श करना।

ऑब्जेक्टिक्स (Objectics): संचार में वस्तुओं, आदि का प्रयोग करना किसी वस्तु की ओर इंगित करना, आदि।

चरोनेमिक्स (Chronemies): समयका प्रयोग-किस समय क्या बात कहनी है, आदि। यूरोपियन या जापानी लोग भारतीय लोगों की तुलना में बहुत ही समयबद्ध है, यह भी एक प्रकार से संचार का ही भाग है।

ओल्फस्टिकस (Olfactics): गंध/महक, आदि का प्रयोग–यदि आप कोई इत्र क्रय करना चाहते हैं, तब उसकी सुगन्ध एक प्रकार से संदेश ही है। इसका प्रभाव सुनने या देखने से भी ज्यादा दीर्घकालिक है।

गुस्ट्रिक्स (Gustorics): स्वाद का प्रयोग।

 

उद्देश्य और शैली के आधार पर संचार का वर्गीकरण (Classification Based on Purpose and Style)

औपचारिक संचार (Formal Communication) औपचारिक संचार में संदेश को नियत एवं सम्प्रेषित करते समय कुछ निश्चित नियमों और अधिनियमों का पालन किया। जाता है। यह एक प्रकार की संगठनात्मक संरचना है।

इसमें सही भाषा और सही उच्चारण की आवश्यकता होती है।

औपचारिक संचार प्रक्रिया किसी संगठन के विभिन्न चरणों या स्तरों से गुजरती है, जिसको स्केलर चैन (scalar chain) भी कहा जाता है। किसी भी संगठन के लिए

औपचारिक संचार प्रणाली आवश्यक है, इससे निम्नलिखि  लाभ मिलते हैं:

  1. निर्विघ्न संचार (Smooth Communication:

औपचारिक संचार पूर्व-निर्धारित चैनल के माध्यम – चलता है, इसलिए हर प्रतिभागी इस बात से अवगत है कि संदेश कहां और कैसे भेजना है। इसलिए इस इसे त्रुटिरहित माना जाता है।

  1. दक्षता में वृद्धि (Increase in Efficiency): इस तरह के संचार से प्रबंधन की समग्र दक्षता में वृद्धि होती है, इससे निश्चितता का अवयव बढ़ता है। लेकिन इसके लिए संगठनात्मक नियमों और प्रक्रियाओं का सदैव अनुपालन किया जाना आवश्यक है।
  2. स्थायी रिकार्ड (Permanent Record): पत्र रिपोर्ट और मेमो जैसे सभी औपचारिक संचार को स्थायी रूप से रखा जाता है। इसलिए भविष्य में निर्णय लेने में यह सहायक है।
  3. अनुशासन (Discipline): यह संचार किसी में संगठन के कर्मचारियों के मन में अनुशासन कि भावना पैदा करता है।
  4. कार्यसमन्वय (Coordination): औपचारिक संचार एक संगठन के विभिन्न कार्यों और विभागों के बीच समन्वय के लिए भूमिका प्रदान करता है, इसमें संसाधनों का भी उचित उपयोग हो पाता है।
  5. विश्वसनीयता (Credibility): उद्देश्य, आदेश और निर्देश, आदि जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों के संदर्भ में औपचारिक संचार अधिक विश्वसनीय है।
  6. सूचना का सामान्य प्रवाह (Smooth Flow of Information): यह संगठन को प्रभावी और उपयोगी बनाने के लिए आंतरिक और बाह्य दोनों संचार सुनिश्चित करता है। कोई भी मूल प्रवाह या मार्ग को निरंकुश ढंग से बाधित नहीं कर सकता

कमियाँ (Limitations)

  1. सत्तावाद की संभावना (Possibility of Being Authoritarian): इसमें उच्च स्तर के प्रबंधन अधिकारियों द्वारा निचले स्तर के कर्मचारियों के प्रति हावी होने की संभावना रहती है।
  2. अनम्यता (Inflexibility): चूंकि औपचारिक संचार अनम्य है, इसमें कई बार परिस्थितियों के अनुरूप ढाल पाना कठिन हो जाता है।
  3. महंगा (Costly): इस प्रकार के संचार में सभी औपचारिकताओं का रख-रखाव किया जाता है, जिसके कारण लागत अधिक हो जाती है।
  4. समय का अपव्यय (Wastage of Time): अधिक स्तर होने के कारण सूचना को गंतव्य तक पहुंचने के लिए अधिक समय लगता है।
  5. निर्णय लेने में विलंब (Delay in Decision Making): सभी प्रतिभागियों के लिए आवश्यक है। कि वे औपचारिक संचार विशिष्ट ढांचे को बनाए रखें चाहे इसके लिए निर्णय लेने की प्रक्रिया में विलंब ही क्यों न हो?
  6. पहल का अभाव (Lack of Initiative): यह संचार प्रणाली इस परिकल्पना पर आधारित है कि यह सर्वोत्तम है, इसलिए किसी भी अन्य प्रणाली के चयन करने का कोई विकल्प नहीं है। परिणामस्वरूप रचनात्मक विचारों को यहां अनदेखा किया जाता है।
  7. सौहार्द का अभाव (Lack of Cordiality): मानव पक्ष की बजाय औपचारिकताओं को अधिक जोर दिया जाता है।

अनौपचारिक संचार (Informal Communication)

कोई भी संस्थान या व्यक्ति-समूह अनौपचारिक संचार के बना संभव नहीं है। हर संगठन में अनौपचारिक संचार-प्रणाली के साथ औपचारिक संचार-प्रणाली अपने आप ही सम्मिलित हो जाती है। यह मुख्य रूप से कर्मचारियों की सामाजिक आवश्यकताओं (social needs) की पूर्ति करती है। इसे अंतर्वैयक्तिक संचार (inter-personal communication) में कहते हैं। यह मुख्य रूप से आमने-सामने वार्तालाप एवं शरीर के हाव-भाव (bodily movements) से होता है, और नेत्रों और परिवार के बीच होता है। | अनौपचारिक संचार में, संचार के लिए कोई औपचारिक नियम और अधिनियम नहीं होते हैं। इसलिए अनौपचारिक संवाद या संचार में संदेश के विरूपण या विकृत ने की (distortion) की सम्भावना सदैव रहती है, जिससे ल संदेश कई बार अपना सही अर्थ खो बैठता है जिसको अॅपवाइन’ (grapevine) कहा जाता है।

दिशा के आधार पर संचार का वर्गीकरण (Classification on the Basis of Direction) लंबवत संचार (Vertical Communication) यह मुख्य रूप रेखा औपचारिक संचार तंत्र जैसी ही है।

  1. यह मूल रूप से औपचारिक संचार ही होता है।
  2. यह नीचे से ऊपर, और ऊपर से नीचे की ओर हो सकता है। जैसा कि मुख्याध्यापक शिक्षकों को निर्देश देता है, और शिक्षक मुख्याध्यापक को रिपोर्ट करते हैं.

क्षैतिज संचार (Horizontal Communication)

जब किसी संगठन के एक ही स्तर के लोग आपस में संचार करते हैं, तो उसे क्षैतिज संचार’ कहा जाता है। इसके अंतर्गत औपचारिक एवं अनौपचारिक दोनों ही संचार आ जाते हैं। यह संचार समूह बनाने (team building) में उत्प्रेरक का कार्य करता है। यदि किसी संगठन में विभिन्न व्यक्तियों या विभागों में परस्पर-निर्भरता ज्यादा हो, तो क्षैतिज संचार ज्यादा होने | की सम्भावना होती है।

तिर्यक संचार (Diagonal Communication)

जब पदसोपान (official hierarchy) के विपरीत विभिन्न स्तरों के अधिकारी और कार्मिक एक-दूसरे से सम्पर्क स्थापित करते हैं तो उसको तिर्यक संचार कहा जाता है। इसमें संचार, विभिन्न विभागों में पृथक स्तरों के बीच में होता है। उदाहरण के लिए, किसी महाविद्यालय के भौतिकी विभाग  के मुख्य (Head of Department) का रसायन विभाग के किसी शिक्षक से प्रत्यक्ष संचार स्थापित करना। इससे समय की भी बचत होती है।

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