Nta Ugc Net Communication Study Material Pdf : कक्षा संचार (Classroom Communication)

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कक्षा संचार (Classroom Communication)

कक्षा शिक्षण इस डिजिटल युग में भी औपचारिक शिक्षा में प्रभावशाली भूमिका अदा करता है। | कक्षा शिक्षण का मुख्य उद्देश्य संज्ञानात्मक अनुक्षेत्र में शिक्षण उद्देश्यों को पूरा करना है, जो कि मुख्यता ज्ञान, समझ, आवेदन, विश्लेषण, संश्लेषण जैसी क्षमताओं को विकसित करने से संबंधित है। इसलिए संचार किसी भी शिक्षण प्रक्रिया का अभिन्न अंग है। यह प्रक्रिया शिक्षक, विद्यार्थी, संदेश, अनुदेशात्मक विधियों (Instructional methods) और संचार मीडिया जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है। इनको समझ कर ही हम कक्षा शिक्षण को ज्यादा प्रभावशाली बना सकते हैं। संचार कौशल को प्रशिक्षण (training) और अभ्यास (practice) से बेहतर बनाया जा सकता है।

सारा संचार संकेतों पर आधारित होता है, पहले की परिभाषाओं से थोड़ा विभिन्न तरीके से सोचें, तो यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें इन संकेतों का एक उचित आयोजन, चयन एवं संचारण शामिल है। |

कक्षा में प्रभावी संचार (Effective Communication in Classroom)

प्रत्येक शिक्षक में उच्च आदर्शों के प्रचार-प्रसार की योग्यता होनी चाहिए। एक सफल शिक्षक को अपने विषय : का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए। साथ ही उसे अपने विषय में रुचि भी होनी चाहिए, तभी वह छात्रों की रुचि अपने विषय के प्रति जागृत कर सकता है। एक सफल शिक्षक को अनुशासित तथा अपने विद्यार्थियों के लिए आदर्श होना चाहिए। एक सफल शिक्षक अपने शिक्षण में नई तथा उत्तम पाठ योजनाओं का समावेश करते हुए, अपने छात्रों को विषय का पूर्ण ज्ञान देने के लिए प्रोजेक्टर, टी.वी. तथा शिक्षा के क्षेत्र में उपयोग – होने वाले नवीनतम उपकरणों का प्रयोग करता है। उत्तम शिक्षक की शैली प्रजातान्त्रिक मूल्यों के अनुरूप होनी चाहिए, जो छात्रों के लिए प्रेरणास्पद व प्रगतिशील हो। जीवन के प्रति एक उत्तम शिक्षक का दृष्टिकोण सकारात्मक होना चाहिए। जिससे वह छात्रों मे आत्मविश्वास पैदा कर सकें। शिक्षक को शिक्षण अधिगम परिस्थितियों को कक्षा में और कक्षा के बाहर निर्मित कर सकना चाहिए। उन्हें विचार करने, तर्क करने और समस्या हल करने के लिए मौका भी देना चाहिए। |

शिक्षक को छात्रों के व्यक्तिगत अन्तरों की भी जानकारी होनी चाहिए और उसे ऐसी विधियों और सामग्री का उपयोग करना चाहिए, जो छात्रों के योग्यता स्तर के अनुकूल हों। धीमी गति से सीखने वाले छात्रों को पढ़ाने में खासतौर से काफी धीरज की आवश्यकता होती है। जिसमें छात्रों को प्रश्न-पूछने में और अपनी राय व्यक्त करने में पूरी स्वतन्त्रता हो। छात्रों के विचारों को ध्यान से सुनना तथा उपयुक्त विचारों की सराहना करना तथा गलत धारणाओं को विचार-विनियम और व्याख्या द्वारा सही करना चाहिए। | शिक्षक को उपलब्ध स्रोतों से अपने ज्ञान में आधुनिक गतिविधियों का समावेश करते रहना चाहिए। शिक्षक को सभी छात्रों, उनके अभिभावकों और सामान्य जनता के साथ सम्पर्क रखने चाहिए। प्रत्येक शिक्षक को यह समझना चाहिए कि इन सम्बन्धों पर उनकी सफलता बहुत कुछ निर्भर करती है।

शिक्षक के मन में केवल बच्चे का हित ही होना चाहिए, तभी वह अपने सभी छात्रों का पूरी लगन के साथकाम करवा सकेगा, जो उसकी सफलता का आधार होगा। शिक्षक को प्रत्येक छात्र और उसके घर की पृष्ठभूमि जाननी चाहिए। इस जानकारी के बिना सभी छात्रों के प्रति वह न्यायोचित व्यवहार नहीं कर सकेगा। इसे प्राप्त करने के लिए शिक्षक को प्रत्येक छात्र के परिवार से परिचित होना चाहिए। इस सम्पर्क के द्वारा वह अपने शिक्षण को अधिक लाभप्रद बना सकेगा। अभिभावक-शिक्षक-सहयोग ‘शिक्षण’ को प्रभावशाली बनाने में बहुत महत्वपूर्ण कारक है। आजकल अनेक ज्ञानवर्द्धक, उपयोगी और रोचक कार्यक्रम आकाशवाणी, दूरदर्शन पर प्रसारित होते हैं, शिक्षकों को अपना ज्ञान सम्बर्द्धन करने के लिए इनका उपयोग करना चाहिए|

कक्षा संचार के निम्न चार सोपान हैं:

  1. शिक्षार्थी में रुचि पैदा करना (Creating Interest Among Students): कक्षा के प्रारम्भ में हो विषय-वस्तु का छात्रों की जिज्ञासा, अनुभव, और पूर्व ज्ञान से सम्बद्ध करना सहायक होता है। उनको यह बताना आवश्यक है कि विषय-वस्तु उनके लिए कैसे महत्त्वपूर्ण है। छात्रों में और जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होनी चाहिए। विषय को कहानी की तरह आरम्भ करना चाहिए। भावनात्मक सम्पर्क तथ्यों से ज्यादा आवश्यक होता है। शिक्षक जानबूझ कर नकारात्मक शब्दों का प्रयोग करके भी छात्रों में रुचि पैदा कर सकता है मैं नहीं | जानता कि आपको यह अध्याय कितना रुचिकर लगता है या इसका कितना महत्त्व है? इससे विद्यार्थियों के सामने चुनौती उत्पन्न हो जाती है, वे जानकारी प्राप्त करने के लिए उत्सुक हो जाते हैं
  1. विषयवस्तु को संगठित करना (Organizing Content Matter): पाठ्य-वस्तु को तर्कसंगत ढंग से संरचित करना, उसको एक कहानी के रूप में प्रस्तुत करना, तत्पश्चात, समस्या को सामने रखना, और उसका कालक्रम के अनुसार घटनाओं और प्रक्रियाओं का वर्णन करते हुए उसका समाधान विकसित करना, विभिन्न विचारों का परस्पर संबंध | स्थापित करते हुए एक थीम विकसित हो जाता है। विषय की रूपरेखा (outlines) छात्रों को विचारों । को संगठित करने और उनके सीखने को आत्मसात करने में सहायता कर सकते हैं।
  1. उद्देश्यों के अनुरूप पुनरावलोकन (Review According to Objectives): प्रमुख विचारों और अवधारणाओं को दोहराना, छात्रों को उनके महत्त्व पर बल देना, मुख्य बिंदुओं (main points) और विपरीत विचारों की संक्षेप में एक-दूसरे के साथ तुलना करना, रूपांतरों की चर्चा, इत्यादि कक्षा शिक्षण में सहायता करते हैं। छात्रों को कुछ गतिविधियों में लिप्त करके अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
  2. प्रतिपुष्टि (Feedback): एक शिक्षक के लिए प्रतिपुष्टि के क्या मायने है क्या वे शिक्षक को देख रहे हैं या खिड़की से बाहर झाँक रहे हैं? वे कक्षा में बैठे नोट्स बना रहे हैं या उनमें कुर्सियों का फेरबदल तो नहीं चल रहा? प्रश्न पूछने या उत्तर देने के लिए हाथ उठाते हैं या नहीं? शिक्षक को इन सब पहलूओं का ध्यान रखना होता है। | शिक्षक के लिए आवश्यक है कि वे इस बात की जानकारी रखें कि छात्र सूक्ष्म और प्रत्यक्ष ढंग से कैसे प्रतिक्रिया या प्रतिपुष्टि देते हैं। कुशल शिक्षक इस जानकारी का संचार प्रक्रिया पर अपेक्षाकृत अधिक नियन्त्रण कर सकते हैं। शिक्षक के लिए यह भी आवश्यक है कि वे संचार प्रक्रिया में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचें। । पलकें फहराना, भौं को ऊपर उठाना, चेहरे का भाव बनाना, स्पष्टीकरण माँगना, आदि प्रतिपुष्टि के ही विभिन्न रूप हैं। आमने-सामने संचार से संदेश प्राप्तकर्ता सहज एवं प्रत्यक्ष रूप और तुरंत प्रतिक्रिया दे सकता है। इससे संचार प्रक्रिया में संशोधन और उसको प्रभावी बनाने की सम्भावना बढ़ती है। अधिकतर कक्षा संवादों में, जहाँ पर छात्रों को उन्मुक्त वातावरण प्रदान किया जाए, शिक्षक एवं छात्रों की भूमिकाओं में निरंतर परिवर्तन होता रहता है। कई बार संचार-प्रक्रिया पलट भी जाती है, तब शिक्षण छात्र केंद्रित भी हो सकता है।

प्रभावी कक्षा संचार के सिद्धांत (Principles of Effective Classroom Communication)

कक्षा संचार की प्रभावशीलता प्रमुख कारकों पर निर्भर करती ई-शिक्षक, छात्र, संदेश, शिक्षण विधि और मीडिया, और अधिगम-वातावरण (learning environment)। कक्षा संचार के सिद्धांतों को निम्नलिखित चार शीर्षकों के अंतर्गत । र्णत किया गया है:

  1. शिक्षकों के लिए सिद्धांत
  2. संदेश-नियत (message design) करने के सिद्धांत 3.शिक्षण-विधियों और मीडिया के चयन के लिए सिद्धांत
  3. अनुकूल शिक्षण वातावरण बनाने के लिए सिद्धांत

शक्षकों के लिए सिद्धांत (Principles for Teachers)

  1. एक यथार्थवादी आत्म अवधारणा और आसपास के वातावरण के बारे में संवेदनशील होना (Develop a Realistic Self-concept and a Perception About Surroundings): इसमें छात्रों की सामर्थ्य और दुर्बलताओं का विश्लेषण, उनकी क्षमता जानने का प्रयास और वास्तविकता कोस्वीकार करना शामिल है
  2. विषयवस्तु में दक्षता का विकास (Develop Proficiency in the Subject Matter): एक शिक्षक को सदैव अपने ज्ञान-वर्धन के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। इसके लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (U.G.C) और दूसरी संस्थाएँ समय-समय पर लघु अवधि के पाठ्यक्रम (short term courses) प्रायोजित करती रहती है। जिसके कारण शिक्षक का आत्मविश्वास और शिक्षण अभिक्षमता बढ़ती है। शिक्षकों को नई शिक्षण तकनीकों से भी अवगत करवाया जाता है।
  3. शिक्षार्थियों को समझना (Understand the Learners): शिक्षक को शिक्षार्थियों के बारे में ज्यादा जानकारी लेने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। यह जानकारी पूर्व ज्ञान, अधिगम-शैली, ज्ञान-संबंधी शैलियों (cognitive styles), प्रेरणा-सिद्धांतों (motivational theories) और अभिरुचियों (interests), आदि के बारे में हो सकती है। शिक्षक को इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए कि कोई दो छात्र एक जैसे नहीं होते हैं और उनके साथ एक समान व्यवहार नहीं किया जा सकता।
  4. प्रभावी संचार कौशल (Effective Communication Skills): इसके अंतर्गत शाब्दिक एवं अशाब्दिक, मौखिक एवं लिखित सभी प्रकार की संचार कौशल आते हैं, जिनको सतत् अभ्यास से प्राप्त किया जा सकता है।
  5. शिक्षाविज्ञान (Pedagogy) और छात्र-केंद्रित (Androgyny) दृष्टिकोण: इन दोनों के सम्मिश्रण से कक्षा-संचार को प्रभावी बनाया जा सकता है।
  6. शिक्षक का वस्तुनिष्ठ (Objective) और कर्तव्यनिष्ठ (Conscientious) होनाः छात्र इन दोनों गुणों के आधार पर शिक्षक का सम्मान करते हैं, इससे कक्षा में संचार और भी प्रभावी हो जाता है। शिक्षक को कुछ बातों में लचीला रुख भी अपनाना चाहिए।

संदेश नियत करने के सिद्धांत (Principles for Message Design)

  1. स्पष्ट और निर्दिष्ट उद्देश्य (Clear and Specific Objectives): इसको वर्णित करने के लिए हम SMART शब्द का प्रयोग करते हैं।

* S-Specifc (विशिष्ट)

 * MLMeasurable (परिमेय)

* A-Achievable (निष्पाद्य)

* R-Realistic (यथार्थवादी)

* T—Time framed (निर्धारित समय-सीमा)

 

  1. उचित अनुक्रम (Proper Sequence): इसमें पहले अध्याय में वर्णित शिक्षण के सिद्धांतों का फिर से उल्लेख किया जा सकता है, जैसे—सरल से जटिल की ओर, आसान से कठिन की ओर, मूर्त से अमूर्त की ओर, इत्यादि जिनका वर्णन हम पहले यूनिट में भी कर चुके हैं।
  1. सुबोध भाषा का उपयोग (Comprehensible Language): कक्षा संचार में ज्यादा तकनीकी भाषा का उपयोग सोच समझ कर ही करना चाहिए।
  1. उचित प्रतीक (Right Symbols): आजकल सोशल मीडिया, जैसे–फेसबुक और ट्विटर पर काफी मानकीकृत प्रतीकों का उपयोग किया जाता है। ट्रैफिक लाइट्स पर उपयुक्त संकेत भी इसका उदाहरण है।
  2. प्रासंगिक अभ्यास (Relevant Practice): यह विद्यार्थी के कक्षा एवं मानसिक स्तर के अनुरूप दिए जा सकते हैं।
  3. उदाहरण एवं दृष्टान्त (Illustrations): इससे प्रभावी कक्षा-संचार में सहायता मिलती है। प्रासंगिक अभ्यास का उपयोग कठिनाई के स्तर के अनुसार किया जा सकता है।

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